विनोद-वार्ता : गुस्सा संक्रामक होता है!


- रोशन जोशी 
 
पर मैं डोम्बिवली की कर रहा था। आमतौर पर मैं भी एक आम मुंबईकर की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ही सफर करता हूं। मुझे कभी बहुत अर्जेंट हो या फैमिली के साथ कहीं जाना हो तो प्राइवेट कैब हायर करता हूं। मुंबई-ठाणे में वैसे भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सर्विस बहुत जबर्दस्त है। बस में बैठते ही ने बारी-बारी से टिकट काटना शुरू किया। मेरे पास जैसे ही कंडक्टर आया, मैंने 20 का नोट आगे बढ़ाया। 
 
'छुट्टा दे', वो झल्लाया।
 
'छुट्टा नहीं है मास्टर।'
 
'तो मैं क्या करेगा? सबका सब साला इधर 100/- 50/- का नोट लेकर चढ़ता है बस में।'
 
'मैं तो तेरे को 20 का नोट दे रहा है।'
 
'अभी 7 रुपया वापस देने को किधर से लाएगा मैं? वो मेरे को 100 का नोट दिया। वो काका 50 का नोट दिया। ये मैडम 500 दिखा रेली है। अभी मि काय करणार?'
 
'मैं भी क्या करूं यार?'
 
'अब तूने तो हाथ ऊंचे कर दिए, मेरे को तो तफलीक हो गया ना।'
 
'एक काम कर मास्टर। 7 रुपया रख ले। मत कर वापस।'
 
'भीख देरा है क्या? '
 
'भीख की क्या बात है? इत्ता गुस्सा खाली-पीली कायको करता है। गरम मगज नहीं रखने का।'
 
(इतने में पड़ोस में बैठे सज्जन ने 3 रुपए दिए। कंडक्टर ने 10 रुपए का नोट वापस किया। मैंने उस बुजुर्ग सज्जन को थैंक्स कहा। मैंने अपने बैग में रखी एक कैडबरी उन्हें ऑफर की। उन्होंने डायबिटीज कहकर नम्रतापूर्वक इंकार किया।)
 
बस से उतरते समय कंडक्टर ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा- 'माफ करना भाऊ। सुबह-सुबह बायको से मच-मच हो गया था इसलिए।'
 
मैंने भी मुस्कुराकर उसे जवाब दिया।
 
'मैं भी समझ गया था, पर थोड़ा देर से।'
 
(एक जोर का ठहाका हम दोनों ने लगाया। बस की सवारी अलट-पलटकर हमें देखती-मुस्कुराती उतरने लगी। मैं भी लोकल पकड़ने स्टेशन की तरफ भागा।)
 
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नोट : शादीशुदा यारों, जीयो और जीने दो। आप लोग अपना टेंशन घर से बाहर भी फैला रहे हों। गुस्सा संक्रामक होता है।
 
 

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