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मिर्जा गालिब : अपनी सोच के जादू से नई दुनिया रचने वाली शख़्सियत

बुधवार,दिसंबर 26, 2018
Mirza Ghalib
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बूढ़े को मां की गाली

मंगलवार,जून 19, 2012
गालिब को उनके हासिद अक्सर फहश ख़त लिखा करते थे- किसी ने एक ख़त मे गालिब को मां की गाली लिखी। पढ़कर गालिब मुस्कुराए और कहने लगे- उल्लू को गाली देना भी नही आती। बूढ़े या अधेड उम्र के लोगों को बेटी की गाली देते हैं ताकि उसको गैरत आए।
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ग़ालिब का ख़त-45

बुधवार,जून 17, 2009
अंदोह-ए-फ़िराक़ ने वो फ़शार दिया कि जौहर-ए-रूह गुदाज़ पाकर हर बुन-ए-मू से टपक गया। अगर आपके इक़बाल की ताईद न होती, तो दिल्ली तक मेरा‍ ज़िंदा पहुँचना मुहाल था।
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ग़ालिब का ख़त-44

बुधवार,जून 17, 2009
तुझको लिखूँ कि तेरा बाप मर गया और अगर लिखूँ तो फिर आगे क्या लिखूँ कि अब क्या करो। मगर सब्र वह एक शेवा-ए-फ़र्सूदा इब्नाए रोजगार का है। ताजियत यूँ ही किया करते हैं और यही कहा करते हैं कि सब्र करो।
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ग़ालिब का ख़त-43

बुधवार,जून 17, 2009
तुम्हारा ख़त रामपुर पहुँचा और रामपुर से दिल्ली आया। मैं 23 शाबान को रामपुर से चला और 30 शाबान को दिल्ली पहुँचा। उसी दिन चाँद हुआ। यक शंबा रमज़ान की पहली, आज दो शंबा 9 रमज़ान की है।
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ग़ालिब का ख़त-42

सोमवार,अप्रैल 13, 2009
मेरा हाल सिवाय मेरे ख़ुदा और ख़ुदाबंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक़्‍ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-ग़म में मेरी कुव्वत मुतफ़क्रा में फ़र्क आ गया हो तो क्या अजब है?
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ग़ालिब का ख़त-41

सोमवार,अप्रैल 13, 2009
पाँच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बाग़ियों का लश्कर, उसमें पहले शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर ख़ाकियों का, उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए।
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ग़ालिब का ख़त-40

सोमवार,अप्रैल 13, 2009
पेंशनदारों का इजराए पेंशन, और अहल-ए-शहर की आबादी मसकन, यहाँ उस सूरत पर नहीं है, जैसी और कहीं है। और जगह सियासत है कि मिंजुमला ज़रूरियात-ए-रियासत है, यहाँ क़हर-ए-इलाही है कि मंशा-ए-तबाही है।
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ग़ालिब का ख़त-33

शनिवार,अप्रैल 4, 2009
मुझ पर इताब क्यों है? न मैं तुम तक आ सकता हूँ, न तुम तशरीफ़ ला सकते हो। सिर्फ़ नामा व पयाम। सो आप ही याद कीजिए कि कितने दिन से आपने अपनी और बच्चों की ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत नहीं लिखी।
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ग़ालिब का ख़त-39

बुधवार,फ़रवरी 25, 2009
बहुत दिनों में आपने मुझको याद किया। साल-ए-गुज़श्ता इन दिनों में मैं रामपुर था। मार्च सन् 1860 में यहाँ आ गया हूँ, अब यहीं मैंने आपका ख़त पाया था, आपने सरनामे पर रामपर का नाम नाहक़ लिखा।
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ग़ालिब का ख़त-38

बुधवार,फ़रवरी 25, 2009
बरखुरदार मुंशी जवाहरसिंह को बाद दुआ़-ए-दवाम उम्र-ओ-दौलत मालूम हो। ख़त तुम्हारा पहुँचा। ख़ैर-ओ-आ़फि़यत तुम्हारी मालूम हुई। क़तए जो तुमको मतलब थे उसके हसूल में जो कोशिश हीरासिंह ने की है, मैं तुमसे कह नहीं सकता।
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ग़ालिब का ख़त-18

बुधवार,फ़रवरी 18, 2009
रूठे ही रहोगा या की मनोगे भी? और अगर किसी तरह नहीं मनते हो तो रूठने की वजह तो लिखो। मैं इस तनहाई में सिर्फ़ ख़तों के भरोसे जीता हूँ, यानी जिसका ख़त आया मैंने जाना कि वह शख्स तशरीफ़ लाया।
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ग़ालिब का ख़त-37

गुरुवार,जनवरी 22, 2009
बरख़ुरदार, कामगार, सआ़दत-इक़बाल निशान मुंशी जवाहरसिंह जौहर को बल्लभगढ़ की तहसीलदारी मुबारक हो। 'पीपली' से 'नूह' आए। 'नूह' से 'बल्लभगढ़ गए? अब 'बल्लभगढ़' से दिल्ली आओगे, इंशा अल्लाह।
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गालिब का ख़त-36

शुक्रवार,दिसंबर 26, 2008
शुक्र है ख़ुदा का कि तुम्हारी ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत मालूम हुई। तुम भी ख़ुदा का शुक्र बजा लाओ कि मेरे यहाँ भी इस वक़्त तक ख़ैरियत है। दोनों लड़के खुश हैं। आम-आम करते फिरते हैं। कोई उनको नहीं देता।
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ग़ालिब का ख़त-35

गुरुवार,दिसंबर 11, 2008
मेंह का यह आलम है कि जिधर देखिए, उधर दरिया है। आफ़ताब का नज़र आना बर्क़ का चमकना है, यानी गाहे दिखाई दे जाता है। शहर में मकान बहुत गिरते हैं। इस वक़्त भी मेंह बरस रहा है।
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ग़ालिब का ख़त-34

गुरुवार,दिसंबर 11, 2008
लो साहिब! और तमाशा सुनो। आप मुझको समझाते हैं कि तफ़्ता को आजुर्दा न करो। मैं तो उनके ख़त के न आने से डरा था कि कहीं मुझसे आजुर्दा न हों। बारे जब तुमको लिखा और तुमने ब-आईन-ए-मुनासिब उनको इत्तिला दी, तो उन्होंने मु्‍झको ख़त लिखा।
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ग़ालिब का ख़त-32

गुरुवार,दिसंबर 11, 2008
हाय-हाय वह नेक बख़्त न बची। वाक़ई यह कि तुम पर और उसकी सास पर क्या गुज़री होगी। लड़की तो जानती ही न होगी कि मुझ पर क्या गुज़री। लड़का शायद याद करेगा और पूछेगा कि अम्मा कहाँ हैं।
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ग़ालिब का ख़त-31

गुरुवार,दिसंबर 11, 2008
जी चाहता है बातें करने को। हक़ तआ़ला अब्दुल सलाम की माँ को श़िफ़ा दे और उसके बच्चों पर रहम करे। यह जो तप और खाँसी मुज़मिन हो जाती है, तो यह बीमारी नहीं है, रोग है।
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ग़ालिब का ख़त-30

गुरुवार,नवंबर 6, 2008
परसों शाम को मिर्जा़ यूसुफ़ अली ख़ाँ शहर में पहुँचे और कल मेरे पास आए। बेगम की पर्दानशीन और घर में बहुत लोगों की बीमारी और फिर तुम्हारी उनके हाल पर इनायतें और शाम की सोहबतों में सुखनवरों की हिकायतें, सब बयान कीं।
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ग़ालिब का ख़त- 29

गुरुवार,नवंबर 6, 2008
भाई साहिब मैं भी तुम्हारा हमदर्द हो गया, यानी मंगल के दिन 18 रबीअ़ उल अव्वल को शाम के वक़्त वह फूफी की मैंने बचपने से आज तक उसको माँ समझा था और वह भी मुझको बेटा समझती थी, मर गई।
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