Indore literature festival : मैं अपनी जिंदगी को एक अलग लैंस के साथ देखती हूं : लक्ष्‍मीनारायण त्रिपाठी

किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी से 'वेबदुनिया' की खास बातचीत

वे किन्‍नर हैं। एक संघर्ष के बाद किन्‍नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्‍वर बनी हैं। महाकाल की भक्‍त हैं और कई तरह के सामाजिक कार्यों में उनका योगदान है। लेकिन दूसरी तरफ बहुत स्‍टाइलिश हैं। खुद को आधुनिक कहना पसंद करती हैं और यहां तक कि अपने ब्‍वॉयफ्रेंड के बारे में भी खुलकर बात करती हैं अपने मन की बात की। वे एक हैं और नाम है लक्ष्‍मीनारायण त्रिपाठी।

कई सालों से अपने में कोई बदलाव नहीं करने के सवाल पर वे कहती हैं, लक्ष्मीनारायण पहले कभी नहीं बदली और आगे भी नहीं बदलेगी। हालांकि प्रकृति का नियम है बदलते रहना, लेकिन जो अपनी आत्मा को बदल दे, वो आदमी ही क्या?


किन्‍नर अखाड़े की मुश्‍किलें?


किन्‍नर अखाड़े की स्‍थापना पर उनका कहना है कि कई लोग और अन्य अखाड़े किन्नर अखाड़े के खिलाफ थे, लेकिन मैंने संघर्ष किया और किन्नर अखाड़ा स्थापित किया और अंतत: किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर भी बनी। इसमें कई तरह की बाधाएं आईं, लेकिन जो काम मुझे करना था, वो किया।

उन्‍होंने कहा कि कई संस्‍थाओं से सूफीइज्‍म खत्म हो गया था, इस्‍लामीकरण ज्‍यादा हो गया था इसलिए हमने किन्नर अखाड़ा बनाया। लेकिन कई मुस्लिम मांओं के बच्चों ने भी अखाड़े के निर्माण में साथ दिया। आज जूना अखाड़े के साथ हमारा एग्रीमेंट हैं। फाइनली हमें स्वीकारोक्ति मिली।


मैं अपनी लाइफ चिल करती हूं?


अपने बचपन और परिवार के बारे में निजी बातें करती हुई लक्ष्मी बताती हैं कि मैं अब भी अपने परिवार के किस्सों में जिंदा रहती हूं। मैं अपने अफेयर्स भी अपने पिता के साथ डिस्कस करती थी। स्‍त्री-पुरुष के बीच समानता पर उनका कहना था कि पुरुषार्थ सिर्फ मर्दों की बपौती नहीं, नारी भी पुरुषार्थ कर सकती हैं। मैं मॉडर्न हूं, आधुनिकता मुझे बहुत पसंद है। अब मेरा अफेयर है तो है, मेरा बॉयफ्रेंड है तो है। और मैं अपनी लाइफ चिल करती हूं। जस्‍ट चिल।

हम यूएस और यूरोप के डस्टबिन हो गए?


आधुनिकता का अर्थ अपने आपको छोड़ना नहीं है। दरअसल, मॉडर्न बनने के चक्कर में हम यूएस और यूरोप के डस्टबिन बन गए हैं। हमारे यहां योगा है, लेकिन हम वहां चले जाते हैं। हम अपनी परंपरा को भूल गए। हम अपनी शिक्षा और कानून में बदलाव क्यों नहीं करते? जैसा अंग्रेज छोड़कर गए, उसी को झेल रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि किन्नरों को देखने का नजरिया बदलना होगा। किन्नर सिर्फ ताली बजाने और देह बेचने के लिए ही नहीं हैं।

यह सब सक्सेस स्‍टोरी है?


अगर परिजन अपने गे, ट्रांसजेंडर बच्चों को अपनाएंगे तो वे बच्चे हमारे पास क्यों आएंगे? यह हम सबकी, समाज की जिम्मेदारी और कर्तव्य है कि हम ऐसे लोगों को अपनाएं। बदलाव के लिए लड़ना होगा, हम लड़े इसीलिए तो आज 70 साल बाद भारतीय हुए। जो मैं कर रही हूं, वो तो सरकार की जिम्मेदारी है। हमारे समुदाय में इंजीनियर हैं, मॉडलिंग एजेंसी शुरू करने वाले लोग हैं, कोई पढ़ा रहा है बड़े संस्थानों में। कई क्षेत्रों में हमारे समुदाय के लोग बड़ी जगहों पर हैं। यही हमारी सक्सेस स्टोरी है। मैं अपने आपसे प्यार करती हूं इसलिए मैं खुश हूं और सकारात्मक हूं।


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