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हिन्दी में कविता : अब मुझे भगवान मिल गए

शुक्रवार,जनवरी 17, 2020
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कि देखो, फागुन भी टोह ले रहा और खेतों की मेड़ पर उग आईं हैं टेसू चटकाती सुर्ख होती डालियां तो किसी शीत भरी पर गुनगुनी शाम की तरह गुज़र जाओ इस गली अंजुली भर गरमाहट लेकर आभासों के मेरे सूरज मन की मकर राशि में छा जाओ देव ...
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वह पहली छत के दरवाजे की चौखट थामे मांगती रही सदा उसके हिस्से का आकाश उड़ाने के लिए अपनी पतंग! फकत मांगने से, नहीं मिला कभी उसे उसके हिस्से का आकाश और उड़ा न सकी वह आज तक अपनी कोई पतंग ! उस दूसरी ने कभी नहीं मांगा आकाश का कोना बस ...
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)।
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महानगर के व्यस्ततम सड़कों पर घने कोहरे और हड्डियों को कंपा देने वाली शीत के मध्य बड़ी-बड़ी गाडियों में लोग गतिमान हैं
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उठो, सबेरा हुआ चांद छुप गया रंग बदल गया भानु दस्तक देने लगा दरवाजे पर चिड़ियों की चहचाहट
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यह सर्दी बरपा रही है कैसा कहर। आलम को गिरफ्त में लिए है शीतलहर। ठिठुरन के आगोश में हर बस्ती, गांव, शहर। पारा और भी गिर-गिर जाता है शामो-सहर।।1।।
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New Year 2020 Poem- स्वागत को तैयार रहो तुम। मै जल्द ही आने वाला हूं। बारह महीने साथ रहूंगा। खुशियां भी लाने वाला हूं।
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हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय! मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार। डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं जिसमें नचता भीषण संहार।
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खून क्यों सफेद हो गया? भेद में अभेद खो गया। बंट गए शहीद, गीत कट गए,
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शहर के तमाम बुद्धिजीवियों कथाकारों और कवियों ने हिन्दुस्तान की समस्याओं को लेकर संगोष्ठी की मंच पर हिन्दुस्तान का नक्शा लगा हुआ था
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महाराष्ट्र में तीन होटलों में रुकी थी तीन बारातें। बारातियों से बाहर वालों के मिलने के लाले थे || क्योंकि अन्दर की सरगर्मी थी गोपनीय, पर्दे में,
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अंततः मुबारक महाराष्ट्र को एक तिमुही सरकार। एक राजनीतिक मंडप जिसके हैं तीन मुख्य द्वार ||
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भोपाल गैस त्रासदी पर कविता- आर्तनाद, चीखें अंधे, बहरे चमड़ी उधड़े चेहरे लाखों मासूमों को जो आज भी
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स्कूल जाते बच्चों की मां, उठ जाती है बड़ा पछिलहरा में, कर देती है बच्चों का टिफिन तैयार , उन्हें नहा-धुला और दुलार कर बिठा देती हैं उन्हें बस रिक्शे और ठेले पर
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मैं लखनऊ स्टेशन से बाहर निकलता हूं सामने लिखा हुआ है कि ‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’ भूल-भुलैया और इमामबाड़े से
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ये (नेता) क्या कभी बाज आएंगे अपनी शाश्वत घिनौनी फितरत से।
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वर्षा ने भर दिये ताल सब, नदियां हुईं लबालब। खेत हुए सरसब्ज सभी, उगेंगी सब फसलें अब
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दीपावली पर कविता- सूर्य का तेज, सूर्य की रोशनी, सूर्य का वजूद, दुनिया जानती है।
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निकल दिवाला गया पहिले से,अब आएगी दिवाली। चिंता से मन व्याकुल हो गया, खाली पड़ी है थाली। फरमाइश कैसे पूरी होगी,
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