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जो राष्ट्र का मंगल करे, वही राम है : स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज

शुक्रवार,अप्रैल 12, 2019
shri ram navmi
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समाज में फैल रहीं विभिन्न विकृतियों के संबंध में राष्ट्रीय संत मुनिश्री तरुणसागर महाराज कहते थे कि पथ भ्रमित हो चुके समाज को आज संस्कार, चरित्र से ज्यादा नीति शिक्षा की जरूरत है।
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जैनपुराणों के अनुसार संथारा शरीर को त्यागने की एक पवित्र विधि है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है जिसके आधार पर व्यक्ति मृत्यु को पास देखकर
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कोई भी सुरक्षा मनुष्य को मौत से नहीं बचा सकती। मौत के आगे सुरक्षा भी फेल हो जाती है। हम अपने जीवन की रक्षा के लिए भले ही कितने सुरक्षा कर्मचारी तैनात कर लें लेकिन वे मौत से नहीं बचा सकते।
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जिसके भाग्य में जो लिखा है, उसे वही मिलेगा और परेशान होने से कुछ अतिरिक्त प्राप्त नहीं होने वाला। सर्वोच्च सत्ता ईश्वर के ही हाथ में है। अत: यदि वह आपसे नाराज है तो दुनिया की कोई ताकत...
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एक छोटी-सी भूल सदियों की सजा बन जाती है, इसलिए हमें जीवन को सही और व्यवस्थित तरीके से जीना चाहिए। जिन मां-बाप ने हमें खून दिया उन्हें बुढ़ापे में खून के आंसू बहाने पर मजबूर करना कायरता है।
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उठो, जागो और नेक इनसान बनो

शुक्रवार,अगस्त 14, 2015
महापुरुष किसी को बर्बाद करने के लिए नहीं आते, बल्कि आबाद करने के लिए आते हैं। वह हमें आजादी दिलाने के लिए आते हैं न कि गुलाम बनाने के लिए। माथे टिकवाने के लिए नहीं आते बल्कि माथे ऊपर उठाने के लिए आते हैं।
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धर्म के द्वारा पुण्य की पूंजी बढ़ाई जा सकती है। निर्मल और पवित्र मन से भक्ति करने से भगवान के चरणों में स्थान पाया जा सकता है। जब प्यास लगती है, तभी पानी का महत्व समझ मे आता है, ठीक उसी प्रकार भगवान के श्रीचरणों में स्थान प्राप्त करने के लिए हृदय ...
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रामकृष्ण परमहंस एक अद्भुत संत थे। उन्हें संत कहना गलत है, क्योंकि वे परमहंस थे। हिन्दू धर्म में परमहंस की उपाधि उसे दी जाती है, जो समाधि की अंतिम अवस्था में होता है। रामकृष्ण परमहंस ने दुनिया के सभी धर्मों के अनुसार साधना करके उस परम तत्व को महसूस ...
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तुम्हारी वजह से जीते जी किसी की आंखों में आंसू आए तो यह सबसे बड़ा पाप है। लोग मरने के बाद तुम्हारे लिए रोए, यह सबसे बड़ा पुण्य है। इसीलिए जिंदगी में ऐसे काम करो कि, मरने के बाद तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए किसी और को प्रार्थना नहीं करनी पड़े। ...
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मनुष्य को आचार शास्त्र द्वारा सब तरह की ट्रेनिंग दी जाती है। माता, पिता और आचार्य बच्चे के ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करते हैं, उसे शिक्षित और दीक्षित करते हैं। इसी प्रक्रिया में संस्कारवान परिवार परवरिश पाता है।
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आप भगवान के आश्रय में ही हैं, लेकिन भूल गए हैं। सामने वाला दृश्य खराब नहीं है, तुम्हारी आंखें कमजोर हो गई हैं। दृश्य मलीन नहीं है, आंख मलीन है। गले में खराश हो जाए तो तुम्हारा स्वर और शब्द ठीक से नहीं निकल सकता। खराश हो जाए तो तुम्हारा स्वर और शब्द ...
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अगर तुम कोशिश करते हो और फिर भी सफलता नहीं मिलती तो निराश म‍त होओ, बल्कि उस व्यक्ति को याद करो जिसने 21वें वर्ष में वार्ड मेंबर का चुनाव लड़ा और हार गया। 22वें वर्ष में व्यवसाय करना चाहा तो नाकामयाब रहा।
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एक बार गौतम बुद्ध को एक जगह प्रवचन देना था। वक्त हो गया, बुद्ध आए और बिना कुछ बोले वहां से चल दिए। वहां पर करीब-करीब डेढ़ सौ श्रोता उपस्थित होंगे।
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ईश्वर का स्वरूप क्या है?

शुक्रवार,जनवरी 4, 2013
एक महात्मा से किसी ने पूछा- 'ईश्वर का स्वरूप क्या है?' महात्मा ने उसी से पूछ दिया-'तुम अपना स्वरूप जानते हो?'
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नववर्ष 2013 का आगाज मंगलवार के दिन हो रहा है। मंगल का अर्थ सर्वत्र शुभकारी है। भारतीय संस्कृति में लोग अंग्रेजी नववर्ष का स्वागत भी देवदर्शन के साथ करते हैं। ताकि उनके अंतरात्मा की ज्योति उन्हें वर्षभर सुख-समृद्घि और शांति से भरी-पूरी महसूस हो।
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क्या है जीवन का सार....

गुरुवार,दिसंबर 20, 2012
दुख एक मानसिक कल्पना है। कोई पदार्थ, व्यक्ति या क्रिया दुख नहीं है। संसार के सब नाम-रूप गधा-हाथी, स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि खिलौने हैं। हम अपने को खिलौना मानेंगे तो गधा या हाथी होने का सुख-दुख होगा, अपने को स्वर्ण, मूल्यधातु देखेंगे तो ...
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एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहते थे और उन्हें योगाभ्यास सिखाते थे। वह सत्संग भी करते थे। एक शिष्य चंचल बुद्धि का था। बार-बार गुरु से कहता, आप कहां जंगल में पड़े हैं, चलिए एक बार नगर की सैर करके आते हैं।
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गहन वन से तृषार्त पाण्डव गुजर रहे थे। पानी की तलाश में वे इधर-उधर घूम ही रहे थे कि अकस्मात उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव जल पीने के पूर्व ही मृत्यु का ग्रास बन गए।
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यह आर्थिक युग है। इसमें पदार्थ की अधिक इच्छा के कारण व्यक्ति अशांत रहता है। अति योगवाद स्वच्छंद और अनियंत्रित भोगवाद के कारण स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं हो पा रहा है। इसके लिए हर मनुष्य को अनुशासित व संस्कारित होना
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