बिना शर्त के प्रेम का जादू

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'चिकन सूप फॉर द सोल' जीवन को सकारात्मकता की ओर ले जाने वाले किस्सों की विश्वभर में लोकप्रिय श्रृंखला है। दिल को छूने वाले इन किस्सों का हिन्दी अनुवाद भी आया है। इसी कड़ी की एक किताब है 'आत्मा के लिए अमृत का दूसरा प्याला'। मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल के लिए इसका अनुवाद किया है डॉ. सुधीर दीक्षित, रजनी दीक्षित ने

कहानी-1.
मेरी माँ को अल्जाइमर्स रोग हो गया था। मेरे पिता भी बीमार रहने लगे थे, इसलिए वे उनकी देखभाल नहीं कर पाते थे। वे अलग-अलग कमरों में रहते थे, लेकिन इसके बावजूद वे ज्यादा से ज्यादा देर तक साथ रहते थे। वे एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। सफेद बालों वाले येदोनों प्रेमी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर घूमते थे, दोस्तों से मिलते थे और प्यार बाँटते थे। वे बुढ़ापे में भी 'रोमांटिक युगल' थे।

जब मुझे लगा कि मेरी माँ की बीमारी बढ़ रही है, तो मैंने उन्हें एक पत्र लिखकर बताया कि मैं उनसे कितना प्यार करता हूँ। मैंने बचपन की शरारतों के लिए उनसे माफी माँगी। मैंने उन्हें बताया कि वे बहुत अच्छी माँ हैं और मुझे उनका बेटा होने पर गर्व है

मैंने उन्हें वे सारी बातें बताईं, जो मैं लंबे समय से कहना चाहता था, लेकिन अपनी जिद के कारण उन्हें अब तक नहीं कह पाया था। अब मैं उन्हें यह इसलिए बता रहा था, क्योंकि मुझे यह एहसास हो चुका था कि शायद कुछ समय बाद वे इस स्थिति में ही न रहें कि शब्दों के पीछे प्रेम को समझ सकें

यह प्रेम से भरी लंबी चिट्ठी थी। मेरे डैडी ने मुझे बताया कि माँ अक्सर उस चिट्ठी को घंटों तक पढ़ती रहती थीं।

इसके कुछ दिनों बाद स्थिति यह हो गई थी कि मेरी माँ अब मुझे नहीं पहचानती थीं। वे अक्सर मुझसे पूछती थीं- 'तुम्हारा क्या नाम है?' इस पर मैं गर्व से जवाब देता था कि मेरा नाम लैरी है और मैं उनका बेटा हूँ। वे मुस्कुराकर मेरा हाथ पकड़ लेती थीं। काश मैं एक बार फिर उस खास स्पर्श को महसूस कर पाता!

एक दिन मैंने अपने मम्मी-डैडी के लिए एक-एक स्ट्रॉबेरी माल्ट खरीदा। मैं सबसे पहले माँ के कमरे में रुका, उन्हें दोबारा अपना परिचय दिया और कुछ मिनट तक बातें करने के बाद दूसरे स्ट्रॉबेरी माल्ट को लेकर अपने डैडी के कमरे में चला गया।

जब तक मैं लौटा, तब तक माँ अपना माल्ट लगभग खत्म कर चुकी थीं और आराम करने के लिए बिस्तर
  जब मुझे लगा कि मेरी माँ की बीमारी बढ़ रही है, तो मैंने उन्हें एक पत्र लिखकर बताया कि मैं उनसे कितना प्यार करता हूँ। मैंने बचपन की शरारतों के लिए उनसे माफी माँगी। मैंने उन्हें बताया कि वे बहुत अच्छी माँ हैं और मुझे उनका बेटा होने पर गर्व है।      
पर लेट चुकी थीं। वे जाग रही थीं और मुझे कमरे में आते देखकर मुस्कुराने लगीं।


कुछ बोले बिना मैंने एक कुर्सी बिस्तर के पास खींच ली और उनका हाथ पकड़ लिया। यह एक दैवी स्पर्श था। मैंने खामोशी से उनके प्रति अपना प्यार जताया। उस शांति में मैं हमारे असीम प्रेम के जादू को महसूस कर सकता था
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