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स्वामी अनूप योगी
Tips for Youth
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कोई भी राज्य उतना बड़ा नहीं होगा जितना अपने मन का राज। इसमें विचार और कल्पनाओं की संख्या इतनी ज्यादा है कि उसे जान पाना सरल नहीं है। शायद इसीलिए एक युवा दूसरे से जितना परेशान नहीं होता उससे कहीं अधिक खुद के विचारों से होता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार 24 घंटे में एक नॉर्मल युवा के मन में लगभग 60,000 विचार चलते हैं और एक पोलिटिशियन व बिजनेसमैन के ब्रैन में कितने विचार चलते हैं इसका अनुमान कोई साइकेट्रिस्ट या साइक्लॉजिस्ट भी नहीं लगा सकता है।

इन सभी विचारों में 95 से 98 फीसदी विचारों का रिपीटेशन होता है। पूरे 24 घंटों में सिर्फ 2 से 5 फीसदी नए थॉट्स या आइडिया यानी विचारों का आगमन होता है जो पर्सनेलिटी डेवलेपमेंट के लिए काफी नहीं होता। स्प्रिच्युअल एक्सपिरिएंस बतलाता है कि किसी भी जॉब में क्रिएटिविटी लाने के लिए ब्रैन में अच्छे विचारों के आने की आवश्यकता होती है।

विचारों का दोहराव मस्तिष्क में जितना अधिक होता है क्रिएटिविटी(रचनात्मकता) उतनी ही कम होती जाती है। यही कारण है कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क और मन में विचारों का अंबार खड़ा हो जाता है और साथ-साथ उस पर उसका कंट्रोल भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। यही कारण है कि मन में विचारों की फ्रीक्वेंसी जरूरत से ज्यादा होने लगती है जिसको सुधार पाना संभव नहीं हो पाता है।

Tips for Youth
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हमें नहीं मालूम कि हजारों असंयमित विचार हमारे मस्तिष्क की अरबों बारीक कोशिकाओं को कितना नुकसान पहुँचाते होंगे। बिलकुल उसी प्रकार जैसे हेवी ट्रैफिक से हर रोज हजारों बेगुनाहों की जान रोड़ पर चली जाती है। कुछ युवाओं को भ्रम है कि विचारों के बढ़ने पर एक्सटर्नल और इंटरनल दुनिया में तेजी से डेवलेपमेंट होता है। किंतु यह सच नहीं है।

विचारों के बढ़ने से बुद्धि का उस पर कंट्रोल कम हो जाता है जिससे अंतर्विरोध यानी कॉन्फ्लिक्ट और कन्फ्यूजन बढ़ता है और डिसीजन मैंकिंग पॉवर कम होने लगती है। जिसके कारण मस्तिष्क में इतने केमिकल चैंजेस होते हैं (मुन्ना भाई का केमिकल लोचा यही है) जिससे मन में कई रोग पनपने लगते हैं। जैसे कॉन्सन्ट्रेशन की कमी, टेंशन, गुस्सा, ईर्ष्या, नफर‍त इत्यादि विषैले ऐलीमेंट्स और साथ ही कई फ‍िजिकल-मेंटल डीसिज होने लगती है।

विचारों पर नियंत्रण नहीं होने से इच्छाएँ बढ़ती हैं। इच्छाओं से ही मन की गति बढ़ती-घटती है। इच्छाएँ ही बेकार के विचारों के बढ़ने का खास कारण हैं और इच्छाओं का ओरीजिन है स्वयं की डिग्निटी व इमोशनल नीड्स को न समझना। यदि हमारी जरूरतें और इच्छाएँ हमारा पड़ोसी डिसाइड करता है तो मन में विचारों की बाढ़ को कंट्रोल कर पाना संभव नहीं।

मस्तिष्क में विचारों की संख्या अनियंत्रित होने पर मन के अंदर रिस्क लेने की क्षमता घटने लगती है जिसके कारण रचनात्मक कामों में बाधा आती है।

कोई भी आइडिया, थॉट या इमेजिनेशन( विचार व कल्पना) यदि प्रैक्टिकली करने योग्य नहीं है तो वह हमारे लिए कूड़े के अलावा और कुछ भी नहीं है। मिट्टी से ही पॉट बन सकता है बालू से नहीं। ऐसी कल्पनाएँ बालू के समान ही हैं जिससे अच्छा ‍बिहेवियर नहीं बनता, अच्छी पर्सनेलिटी नहीं बनती। तो जरा बताएँ आपके मन पर किसका राज चलता है? बेकार के विचारों का या क्रिएटिविटी का?
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