देख जाओ बाबूजी अपने बेटे का पुरुषार्थ
तुम्हारे आदर्श को किया मैंने चरितार्थ।
उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का लिया मैंने संकल्प,
यही तो था तुम्हारे जीवन का निहितार्थ।।
बाई ने तो इस धरती पर हँसना मुझे सिखाया,
तुमने मुझको जीवन में संघर्ष का पाठ पढ़ाया।
तुम ही मेरी शक्ति थे और हौसला थे मेरा,
तुमने ही जीवन का असली मकसद समझाया।।
जानकर मेरी अभिरुचि को दे दी सही दिशा,
जब भी गलत कदम उठा तो दिखाया मुझे शीशा।
साधन की शुचिता पर तुमने दिया हमेशा जोर,
दिशा-दर्शक सदा रही थी जीवन में भगवत् गीता।।
दो-दो नौकरी करके तुमने हम सबको पाला,
हमको खुश रहने की खातिर अपना सुख टाला।
झूठी शान और झूठे मान के पीछे कभी न भागे,
'सादा जीवन-उच्च विचार' को जीवन में ढाला।।
तुम्हारे पदचिह्नों पर चलने का है किया जतन,
मेरे जीवन के आभूषण सत्य, ईमान और लगन।
चादर जितने पैर पसारे, उड़ा नहीं हवाओं में,
मेरे जीवन के साक्षी हैं धरती और गगन।।
बाबूजी यह पाती भेजूँ बतलाओ किस देस में,
तुमको ढूँढूँ कहाँ-किधर मैं आखिर हो किस वेष में।
कुछ पल बस सपनों का दामन ही सहला जाओ,
पीड़ा के बस अर्थ बचे हैं जीवन के अवशेष में।