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पद्मजा सेन

बरसों से मेरे पीछे
दबे पाँव आहटहीन चलता है कौन, न जाने!
अचानक पलटकर
जब भी देखना चाहती हूँ
छिप जाता है
किसी अदृश्य कोने में,
और
मेरे मुड़ते ही फिर से चलने लगता है।
कुछ फासला रखकर सतर्क कदमों से
मैं फिर नहीं मुड़ती
लेकिन मेरे सिर के पीछे
मानो अदृश्य दृष्टि उग आती है
जो देखती रहती
वो अभी भी चल रहा है,
उसी तरह आहटहीन, सतर्क और नीरव!
मेरी हर गतिविधि पर चौकन्नी नजर रखे,
इसी तरह गुजरे हैं
दिन
महीने और वर्ष
मैं चलती हूँ
वो चलता है
और मैं जानती हूँ
मेरे रुकते ही
रुजाएग

सौजन्य से - कथाबिंब
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