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डॉ. सीताराम गुप्त

दुनिया के सुंदर उपवन में
तितली से, फूलों से बच्चे।
अपनी धुन में मस्त व्यस्त
खेलते कूदते प्यारे बच्चे।
चहक रहे पेड़ों पर पक्षी
चहक रहे हैं घर में बच्चे।

बेशकीमती हीरा मोती
भू पर चाँद सितारे बच्चे।
खिलखिलाएँ तो लगे खनकते
कलदारों से प्यारे बच्चे
यशोदा माँ के कृष्ण कन्हैया
दशरथ-राजदुलारे बच्चे।
नव गुलाब के फूल मनोहर
आँखों के तारे हैं बच्चे

फूले नहीं समाते हम जब
गोदी में आ जाते बच्चे
ईश्वर रचित सजीव खिलौने
नन्हे मुन्ने प्यारे बच्चे।

दूध न करती प्रगट प्रकृति माँ।
अगर जन्मे होते बच्चे
मन का बोझ उतर जाता
जब साथ हमारे होते बच्चे
अच्छा हो हम भी बन जाएँ
निर्मल-मन से प्रभु के बच्चे।
इनकी प्रतिभा का विकास हो
होनहार अपने सब बच्चे।
कर्णधार होंगे स्वदेश के
ये निर्भय उत्साही बच्चे।

सौजन्य से - देवपुत्र
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