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काव्य-संसार
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तुम, एक कच्ची रेशम डोर
तुम, एक कच्ची रेशम डोर, तुम, एक झूमता सावन मोर तुम, एक घटा ज्यों गर्मी में गदराई, तुम, चाँदनी रात, मेरे आँगन उतर आई तुम, आकाश का गोरा-गोरा चाँद, तुम, नदी का ठंडा-ठंडा बाँध, तुम, धरा की गहरी-गहरी बाँहें, तुम, आम की मँजरी बिखरी राहें, तुम, पहाड़ से उतरा नीला-सफेद झरना, तुम, चाँद-डोरी से बँधा मेरे सपनों का पलना, तुम, जैसे नौतपा पर बरसी नादान बदली तुम, जैसे सोलह साल की प्रीत हो पहली...
काव्य-संसार
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यादों की कोमल तितली
बस, एक लम्हे के लिए दिखता है तुम्हारा चेहरा और मेरी आँखों की झील में देर तक थरथराता है मुस्कुराता चाँद। बस, एक कोई बात तुम कहते हो यूँ ही और देर तक मेरे मन के आँगन में खेलती है...
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काव्य-संसार
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फाल्गुनी की तीन कविताएँ
खिले थे गुलाबी, नीले, हरे और जामुनी फूल हर उस जगह जहाँ छुआ था तुमने मुझे, महक उठी थी केसर जहाँ चूमा था तुमने मुझे, बही थी मेरे भीतर नशीली बयार जब मुस्कुराए थे तुम और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना जब उठकर चल दिए थे तुम, मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह, तुम आ रहे हो ना थामने आज ख्वाबों में, मेरे दिल का उदास कोना सोना चाहता है...
• कुँवारा रेशम • बादल आए, बचपन लाए
• पलकों की झीनी झालर पर • हरी चूड़‍ियाँ और पहाड़ी चिड़‍िया
• निर्मला भुराड़‍िया को सुभद्रा कुमारी सम्मान • महाभारत की द्रौपदी और बहुपति प्रथा