तुम, एक कच्ची रेशम डोर, तुम, एक झूमता सावन मोर तुम, एक घटा ज्यों गर्मी में गदराई, तुम, चाँदनी रात, मेरे आँगन उतर आई
तुम, आकाश का गोरा-गोरा चाँद, तुम, नदी का ठंडा-ठंडा बाँध, तुम, धरा की गहरी-गहरी बाँहें, तुम, आम की मँजरी बिखरी राहें,
तुम, पहाड़ से उतरा नीला-सफेद झरना, तुम, चाँद-डोरी से बँधा मेरे सपनों का पलना, तुम, जैसे नौतपा पर बरसी नादान बदली
तुम, जैसे सोलह साल की प्रीत हो पहली...