साल 2010 और मन की हलचल

जीवन के रंगमंच से...
आप जो भी हैं, आने वाले साल से आपकी कोई उम्मीद तो होगी ही। आपकी इच्छाएँ, आपके सपने एक उजले भविष्य में फलने-फूलने की राह देख रहे होंगे। आप आम हैं या खास, नए का आगमन आपके मन में आकांक्षाओं की लहरें जगाता है। यदि आप खास हैं तो हर कलम और हर कैमरा आपके इंटरव्यू ले रहा होगा पर आप 'आम' हैं तो भी आपके अरमान अनदेखे नहीं जाएँगे। आने वाले वर्ष के लिए क्या सोचती है एक गृहिणी और क्या उलझन है एक युवा की? उनके मन की हलचल यहाँ प्रस्तुत की जा रही है : गृहिणी '
मैं एक गृहिणी हूँ। मैं चाहती हूँ वह आत्मसम्मान कि लोग मुझे एक व्यक्तित्व के रूप में मान्यता दें। मैं हमेशा से किसी की माँ, किसी की पत्नी, किसी की बहन के रूप में जानी जाती रही हूँ। समय ने मुझे इतना बेबस भी किया है जब दरवाजे पर किसी ने पुकारा है कि घर में कौन है तो मेरे ही मुँह से अकस्मात निकल पड़ा, जी कोई नहीं। यानी समाज तो ठीक, मैं खुद ही भूल गई कि मैं कुछ हूँ। मेरी समस्या मूलतः मेरे व्यक्तित्व की है जिसे इस समाज ने निगल लिया। मेरे बारे में कभी बात भी होती है तो आटा-दाल के भावों पर ठहर जाती है। क्यों किसी को यह दिखाई नहीं पड़ता मैं भी कुछ हूँ? मैं तथाकथित विकसित कहे जाने वाले इस समाज से यह प्रश्न करती हूँ कि आप अपने को सभ्य क्यों कहते हैं? कम से कम मैं तो तब तक इसे सभ्य नहीं कहूँगी, जब तक मेरी अनमोल सेवाओं के प्रति यह समाज कृतज्ञता व्यक्त नहीं करता। जब तक मैं पुरुषों की तरह बेझिझक, बिना फब्तियों के बाजार से अपने घर तक नहीं पहुँच जाती। पर ये उम्मीदें तो मैं हर साल करती हूँ और इस साल भी करूँगी। यह जाता हुआ 2009 तो गुनहगारों की तरह सिर झुकाकर जा रहा है पर आने वाला 2010 तो सक्षम है।'युवा '
मैं एक युवा हूँ। मेरी आशाएँ, मेरे सपने, मेरी तमन्नाएँ..., भला किसी को क्या पड़ी है मेरी! मेरे अंदर उबलते सैलाबों की किसे चिंता! मेरे आत्म-सम्मान को तो ट्रैफिक पुलिस वाले भी रौंद देते हैं। जमाने की ठोकरों से परिपक्व हुआ यह समाज मेरे परिपक्व होने का भी इंतजार नहीं करता। मेरे चेहरे पर पसरी अनुभवहीन गंभीरता को कुरेदने का कोई प्रयास नहीं करता। मेरे जख्मों का किसी को ख्याल नहीं। ऐसे में कई बार मैं आत्महत्या जैसे कदम भी उठा लेता हूँ तो कौन-सा गलत करता हूँ? मैं मानता हूँ कि मैं एक जलजला हूँ, तूफान हूँ, कुछ भी कर सकता हूँ लेकिन हूँ तो इंसान ना! मैं इस समाज से प्रश्न करता हूँ कि जीवन के कठिन झंझावातों को सहने के लिए मुझे कौन-सी ऐसी शिक्षा दी जा रही है? कॉन्वेंटों, सरकारी और अन्य स्कूलों में क्या पढ़ाया जा रहा है? मुझे शक है कि जीवन में यह मेरे कुछ काम आएगा। नौकरी पाने के लिए मुझे जिन पाठ्यक्रमों से रूबरू होना पड़ रहा है, मुझे नहीं लगता कि ये पाठ्यक्रम आगामी नौकरी में मेरा कुछ सहयोग करेंगे। मैं प्रश्न करता हूँ देश के कर्णधारों से कि आखिर वे देश को किस दिशा में हाँक रहे हैं? आज नए साल पर इन संकल्पों का समय नहीं है कि हम ऐसे लोगों को अपनी कमान नहीं सौंप सकते जो हमारे बच्चों की शिक्षा पर भी सही ढंग से नहीं सोच सकते। क्या किसी राष्ट्र का यह कर्तव्य नहीं होता कि भविष्य के लिए ऐसे कंधे तैयार करे जो मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृढ़ हों? क्या अपने कंधे सुदृढ़ करने की सिर्फ मेरी जवाबदारी है?'