विलास पंडित 'मुसाफिर' हाय उस शब को क़यामत कहिए जिस शब् ग़ज़ल भी रोई थी।
सच है, न अब वो शमाखाने हैं, न वो नाशिस्तें, न वो देर रात तलक चलते चाय के दौर, न मुशायरों में लज्ज़तें, न वो शायरों की शायरी! देखते ही देखते दौर कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया। और लगता है हम वहीं के वहीं रह गए। अचानक ज़ेहन की वादियों में पहुँच कर कुछ कह गया कान में वही पुराना दौर। जब ग़ज़ल की नफ़ासत अपने शबाब पर थी, एक से एक धुरंधर शायर अपने शेरों के जरिये सदियों तक लोगों के दिलो-दिमाग पर छाए रहते थे,और एक से एक ग़ज़ल गायक अपनी गायकी और ग़ज़लों से बरसों तक लोगों की खास पसंद बने रहे। सच ही है ये राजसी शौक आज दिखावे के दौर में कहाँ महफूज़ रह सकता है?
दरबारी दौर में पैदा नहीं हुआ था मगर बुजुर्गों से सुनता जरूर था की क्लासिकल म्यूजिक से हुस्न चुराकर ग़ज़ल ने अपने रूप को ऐसा निखारा कि लोग ग़ज़ल के दीवाने हो गए! अपने दौर में मैंने तलत महमूद,मेंहदी हसन खाँ, गुलाम अली, बेगम अख्तर,फरीदा खानम, जगजीत सिंह, तलत अज़ीज़, हरिहरन, अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन, चंदन दास ,भूपिंदर को गाते देखा और सुना। जिन्होंने ग़ज़लों की सादगी को बरकरार रखा।
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जनाब क़तील शिफाई,सलीम कौसर, एहमद फ़राज़,पयाम सईदी, बशीर बद्र,राहत इन्दौरी, निदा फाजली, मुनव्वर राना और मेरे उस्ताद जनाब नसीम रिफत जैसे कई नामी शायरों की एक फेहरिस्त है। जिन्होंने ग़ज़ल को खूब नए-नए अंदाज़ से नवाज़ा। बेशक मतले [मुखड़े] से ग़ज़ल के अगले शेर पर दिल खुद-ब-खुद दाद देता था। और लगता था कि वाकई एक शेर में शायर क्या और कितना कह जाता है।
मैं बेशक ग्वालियर संगीत घराने से हूँ मगर शौक तो ग़ज़ल सुनना और ग़ज़ल कहना ही बन गया। मेरा कोई मज़हब नहीं मैं तो बस इंसान था मगर मराठी परिवार का होने से कोई मेरे शेरों को सुनने को राज़ी नहीं दिखता था, मगर मेरे उस्ताद जनाब नसीम रिफत की हौंसला अफजाई और महबूब शायर निदा साहब की मेरी राहों को बुलंद करती रही।
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मेरे कुछ दोस्तों ने ग्वालियर सांस्कृतिक समिति, के माध्यम से मेरी एक किताब परस्तिश [पूजा] भी प्रकाशित करवाई और मैं विलास पंडित से 'मुसाफ़िर' उपनाम हो गया। और हाँ मेरा नसीब रहा कि गुलाम अली, जगजीत सिंह, तलत अज़ीज़, पीनाज़ मसानी, हरिहरन, चन्दन दास, रूपकुमार राठौड़, कल्यानजी-आनंद जी भाई और भूपिंदर जैसी शख्सियतों से गाहे-बा-गाहे मिलना भी हुआ। लोग भी अजीब ही कहते मुझे ,खानदानी गायकी छोड़ के ग़ज़ल कहता रहता है। मगर मुक़द्दर ने मेरी भी सुनी जब कई गायकों ने राष्ट्रीय स्तर के मंच से मेरी ग़ज़लें गाई।
जब पार्श्व गायक अनवर ने मेरी तीन ग़ज़लें अपने एल्बम तोहफा में गाई तो वो लोग भी कहने लगे कि यार तू वाकई शायर है। हालाँकि कभी-कभी मुझे मेरी ही ग़ज़लें अच्छी नहीं लगी, क्यूँकि ग़ज़ल की जो अदायगी, जो मौसिकी [संगीत] होती है उसमें जब सुर-साज़ यानी हारमोनियम, तबला, सारंगी संतूर साथ नहीं हो तो ग़ज़ल, ग़ज़ल ही कहाँ रह जाती है। मुझे बड़ा दुःख होता है कि आज के दौर में जो लोग ग़ज़ल गा रहे हैं वह विद्युतीय संगीत पर गा रहे हैं, तब शायरी और गायकी के लिए कुछ बचता ही कहाँ है? ग़ज़ल अपने उसी नाजुक रूप में रहने दी जाए तो ही उसका वजूद कायम रहेगा।
शामे-ग़म की कसम-तलत महमूद, रंजिश ही सही- मेंहदी हसन, चुपके चुपके रात दिन-गुलाम अली,आज जाने की जिद-फरीदा खानम,वो कागज़ की कश्ती- जगजीत सिंह, कैसे सुकून पाऊँ -तलत अज़ीज़, हुस्न वालों का खुदा- हरिहरन जैसी कुछ यादगार ग़ज़लें यकीनन ग़ज़ल के चाहने-सराहने वालों के दिलों में आज भी महफूज़ होंगी, ये फेहरिस्त बहुत लम्बी है, इसे पूरा करना आलेख की हदों के चलते मुमकिन भी नहीं है।
दरअसल ग़ज़ल वो महबूब-तरीन विधा है जिसमें दिली जज़्बात,संगीत का मज़ा और उर्दू की समझ तीनों का यकज़ा होना बेहद लाज़मी है। और आज तो हिंदी ही .........(?) माना आज किसी के पास वक़्त नहीं है, लेकिन ये बात तय है कि हमें ही विरासत में मिली हुई कुछ नायाब विधाओं को सहेजना होगा और ग़ज़ल/क्लासिकल के साथ फास्ट फॉरवर्ड का खेल न खेलते हुए इन खूबसूरत विधाओं को कायम रखना होगा ताकि आने वाली पीढियाँ भी इनके वजूद को जान सके।
आप शेर मुलाहिजा फरमाएँ :
थोड़ी बहुत तो भूल करता है आदमी, लेकिन कहाँ कबूल करता है आदमी कहने को वक़्त ही नहीं आखी किसी के पास बातें मगर फ़िजूल करता है आदमी।