कपिल ने कागज ले लिया और चश्मा पहनकर पढ़ने लगा। भावुकता और शेर-ओ-शायरी से भरा एक बचकाना मजमून था। उस कागज को पढ़ते हुए सहसा कपिल के चेहरे पर खिसियाहट भरी मुस्कान फैल गई। बोला, 'यह आपको कहाँ से मिल गया? बहुत पुराना खत है। तीस बरस पहले लिखा गया था।'
क्यों छिप रहा मन मेरा मुझसे
ढूँढे किसी सुकून को,
आशाओं के दीप जलाए
मन खोजे तुम्हें यहाँ-वहाँ,
गीत फुट पड़े
भाव चल पड़े,
थमती हैं देखो मेरी अभिलाषाएँ कहाँ,
यादों में तेरी ...
जिस सोच को हम जितना व्यवस्थित और सुनियोजित मानकर चल रहे थे, दरअसल, उसकी सारी बुनियाद ही गलत नजर आने लगती है। फिर बार-बार यही अफसोस और पछतावा होता है काश यह बात हमें बहुत पहले समझ में आ जाती।