| | | | | | नज़्म---'निसार करूँ' | | हसीन फूलों की रानाइयाँ निसार करूँ------------------
सितारे चाँद कभी, कहकशाँ निसार करूँ
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बहार पेश करूँ गुलसिताँ निसार करूँ
---------- ---- जहाने-हुस्न की रंगीनियाँ निसार करूँ... | | | | | |
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| | | | ग़ालिब की ग़ज़ल (अशआर के मतलब के साथ) | | यार की आदत, दोज़ख़ की दहकती हुई आग की तरह है। मुझे यार की इस गर्म-मिज़ाजी में ही राहत मिलती है। और चूंके दोज़ख़ की आग भी उसके गर्म मिज़ाज की तरह है इसलिए मुझे उसमें भी राहत मिलेगी। | | | | |
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