उसकी खुशी में मेरी खुशी

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ये आँसू जो हैं बहते, बस इतना हैं ये कहते। कहाँ तू और कहाँ मैं, पराया हूँ यहाँ मैं।करम इतना अगर हो कि मुझपे इक नजर हो।' अख्तर साहब की इन पंक्तियों में प्रेम की सारी दुनिया समाई है। प्यार की बेबसी को कोई नहीं समझ सकता। जिस पर बीतती है, वह किसी से कह भी नहीं सकता, ये दिमाग की नहीं दिल की बातें हैं। कई बार होता है कि वह जिससे कहता है वही उसे झिड़कता है। प्यार की बहुत बातें हुईं, पर क्या प्यार को उतना समझा गया है। लोगों ने प्यार को जुनून बना दिया है। इश्क की ताकत गलत राह पकड़कर तेजाब की तरफ मुड़ गई। इश्क इतनी तड़प पैदा नहीं कर पाया कि आयतें उतर पाएँ। प्रेम से मिले सुख को बस हमने स्वीकार किया और उसके दुख को नकार दिया। जबकि यह सभी जानते रहे 'इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।' पूरा फैसला दूसरे के पास है, आपने कहा 'आय लव यू' बात खत्म हो गई। सामने वाला उसका क्या उत्तर देता है यह उस पर है। ये जरूरी नहीं है कि वह आपको प्यार के बदले प्यार ही दे। उससे मिली नफरत, जिल्लत और तौहीन के बाद भी आपके दिल से उसके लिए तेजाब नहीं बस मुस्कराते हुए यही निकले कि 'तू सदा खुश रहे'। आइए जानते हैं प्यार के मामले में नए-नए अध्याय लिखने वाले युवा इसको कैसे लेते हैं। बीकॉम तृतीय वर्ष के छात्र विलास पंडागरे बहुत संजीदगी के साथ कहते हैं, 'क्या बुरी चीज है मुहब्बत भी, बात करने में भी आँख भर आई।' यह बहुत अलग राह है। जब किसी का दिल जलता है तो बहुत दर्द होता है। 'इश्क है ऐ चारागर मेरे! यह वह दर्द नहीं कि कहीं हो, कहीं न हो।' लेकिन कितना अजीब है यह एहसास कि दर्द भी मीठा लगता है। जो दर्द देता है उसके लिए यही निकलता है 'जो कहोगे तुम, कहेंगे हम भी हाँ यूँ सही। आपकी गर यूँ खुशी है मेहरबां यूँ ही सही।' शायद यही प्यार है।छात्र अमर सोलंकी कहते हैं दिल में जब आग लगती है तब कुछ नहीं सूझता है, लेकिन उस आग को भी हम नहीं समझते और दिल के मामले में दिमाग से सलाह लेने लगते हैं। दिल का मामला बड़ा अलग है दिमाग हर चीज पर कब्जा करना चाहता है। जबकि वास्तव में प्रेमी तो वह परवाना होता है जिसे हर हाल में जलना है प्रेमिका मिले या न मिले। क्योंकि वहाँ कुछ पाना नहीं बस खोना है। अब वही सही जो तू कहे, बस तू खुश रहे। यदि किसी के लिए आपके दिल में इतना प्यार पैदा हो रहा है तो वह भी आपसे नहीं बच सकता उसे कुछ न कुछ तो लौटाना ही होगा। कुछ यूँ 'इतना मजबूत है जब अकीदा मेरा, बंदगी मेरे दर से कहाँ जाएगी।' शायद हम प्यार करना नहीं सीख पाते। भले ही कितना भी पढ़ें कि प्रेम पंथ ऐसो कठिन, भले ही कबीर को सुनें कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' ऐसी राह को हमने बहुत सस्ता मान लिया है। प्यार माँग नहीं सिर्फ देना है, अपनी तरफ से निभाना है जिसे अहमद फराज ने क्या खूब कहा हैः-'
उसकी वो जाने उसे पासे-वफा था कि न था,तुम 'फराज' अपनी तरफ से तो निभाते जाते।' संबंधित जानकारी खोजें
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