टेलीविजन पर इन दिनों दिखाए जा रहे धारावाहिकों में महिला पात्रों के कपड़ों-मेकअप और जेवरों को देखकर कोफ्त होने लगती है। चाहे दृश्य रात का हो और वे सो रही हों फिर भी कीमती साड़ियाँ और महँगे जेवर पहने होंगी। कहानी चाहे समृद्ध परिवार की हो या मध्यमवर्गीय परिवार की- महिला पात्रों के रहन-सहन में कोई फर्क नहीं होगा।
फिर जिस पात्र का चरित्र जितना निगेटिव शेड लिए हुए होगा उसके कपड़े, जेवर और मेकअप उतना ही भड़कीला होगा। समझ में नहीं आता कि निर्देशक इस तरह के प्रस्तुतीकरण से संदेश क्या देना चाह रहे हैं?
एक-दो नहीं, बल्कि करीब-करीब सभी धारावाहिकों में नारी पात्र नित नई फैशन के जेवरों व कपड़ों की नुमाइश-सी करती प्रतीत होता है। रोजमर्रा की घटनाएँ हों चाहे कुछ विशेष परिस्थिति, यहाँ तक कि दुखी, सताई जाने वाली महिलाएँ भी भले ही मुँह लटकाए आँसू बहाएँ, भगवान से शिकायत करें, पर कपड़े उनके लकदक! अमीरी का यह भौंडा प्रदर्शन इन्हीं धारावाहिकों में आपको देखने को मिलेगा।
वृद्ध महिला पात्रों को देखकर तो वितृष्णा-सी उपजती है। उनका काम है तथाकथित "परंपरा" का निर्वाह करना, दूसरों के कान भरना, कन्याओं को नसीहत देना कि चाहे जिस कीमत पर हो उन्हें अपनी शादी बनाए रखना है, पति जैसा भी हो उसे पकड़े रहना है। एक पुरातन प्रतिक्रियावादी चरित्र हो, पर शरीर पर आधुनिक जेवरों की कमी नहीं।
और फिर काइयाँ किस्म की फैशनपरस्त चरित्रों की तो बात ही क्या। ये धूर्त, झूठी, हेर-फेर करने वाली अमीरजादियाँ किसी मॉडल से अपने को कम नहीं समझतीं। न तो ऐसी धूर्तता आपको अपने आसपास नजर आएगी, न ऐसी महँगे लिबास में घर में काम करती महिलाएँ। एक छोटे-से गाँव में भी आलीशान बंगले के सर्वसुविधायुक्त रसोईघरों में नई-नकोर डिजाइन वाली खाने की टेबल पर पुरुषों के पीछे खड़ी रहकर खाना खिलाने वाली महिला पात्र तो दुल्हनों को भी मात देती है।
यह पहनावा सिर्फ इसलिए नहीं अखरता कि वे परिस्थिति के अनुरूप या स्वाभाविक नहीं होते, वरन एक गंभीर कारण भी है। आमतौर पर महिला दर्शक और विशेषतः मध्यमवर्गीय स्त्री समाज के मन में ये जेवरों के प्रति एक जबर्दस्त लगाव पैदा करते हैं जबकि ये पहनना उनके वश की बात नहीं है।
वे अपने पतियों या पुत्रों को अनैतिक कार्य कर ज्यादा धनोपार्जन के लिए उकसाती हैं या दबाव डालती हैं। वे इन उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादकों द्वारा किए जा रहे षड्यंत्र से बेखबर रहती हैं, जो इन वस्तुओं की बिक्री से अथाह संपत्ति कमा लेते हैं। किंतु बदले में परिवारों में मनमुटाव व समाज के भ्रष्ट तरीकों में लिप्तता बढ़ जाती है।