हैदराबाद एनकाउंटर : ...तो देर रात तक आप गोलियों की धांय-धांय सुनते रहेंगे

Author नवीन रांगियाल| Last Updated: मंगलवार, 10 दिसंबर 2019 (17:28 IST)







जिस देश में आप रहते हैं वो किसी 70 एमएम की स्‍क्रीन नहीं है। ये वो जगह नहीं है, जहां मजलूम अपने जालिम को घसीटकर लाएगा और उसी जगह पर गोली मारेगा, जहां जालिम ने उसके पिता या भाई की हत्‍या की थी या उसकी बहन का ब्‍लाऊज फाड़कर उसका बलात्‍कार किया था। और फिर इस रिवेंज के प्‍लेजर में झूमते हुए आप और हम मजलूम को हीरो बनाकर अपने कांधों पर बैठाकर नाचेंगे और मंगल गीत गाएंगे।

यह देश है और इसका नाम भारत है और मानवता की एक शाश्‍वत धारणा पर इस देश की रचना हुई है, इसी धारणा पर भारत होने का विचार फूटा है और उसी विचार के बूते पर हम सब जिंदा रहते हैं। अपने जीवन को संचालित करते हैं। इसलिए भारत तालिबान नहीं है, तालिबान भारत नहीं बन सकता। या कोई और देश भारत नहीं हो सकता, यह भी सत्‍य है कि स्‍त्रियों के प्रति अपराध बढ़े हैं और अखबारों में ऐसी खबरें पढ़कर किसी भी औसत गुस्‍से वाला आदमी दांत पीसकर अपने जेहन में यही बुदबुदाएगा कि ऐसे अपराधियों को तो बीच चौराहे पर लटका दिया जाना चाहिए, उसे गोली मार दी जाना चाहिए।

शुक्रवार की सुबह जब पता चला कि दुष्‍कर्म और हत्‍या के आरोपियों को पुलिस ने में ढेर कर दिया है तो प्रथम क्षण बेहद खुशी हुई, हम ही कहते थे सरेआम भून दिया जाना चाहिए, उसके अगले क्षण एक सवाल भी शिकन की तरह उभर आया। जो सवाल है उसका मानवाधिकार से कोई नाता नहीं है, जिस परिकल्‍पना पर इस देश की रचना हुई उसके लड़खड़ाने की बात और सवाल है।

लॉ एंड ऑर्डर में भरोसा खोने की बात है, हमारी अधीरता पर सवाल है, हमारे पाश्‍विकता की ओर बढ़ते कदम की बात है। और इसीलिए सवाल है कि ट्रायल क्यों नहीं? अदालत क्यों नहीं? सबूत क्यों नहीं? चार्जशीट क्यों नहीं? दरअसल, कानून और अदालतें न्याय-व्यवस्था का मूलभूत सिद्धांत है। हालांकि यह लचर है, धीमा है, न्‍याय इतनी धीमी चाल से चलकर आता है कि उम्र सूखे पत्‍ते की तरह झरकर गिर जाती है, प्रतीक्षा में आंखों से इतना मलबा गिर चुका होता है कि वो खंडहरों में तब्‍दील हो जाती हैं। लेकिन बावजूद इस भयावहता के हमारे पास कई विकल्‍प हैं।

हम फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में जा सकते हैं, कई प्रकरण पहले देश में इस तरीके से हल हुए हैं। इसे और सख्त और पारदर्शी बनाया जा सकता है। और सबसे अंत में हम लॉ एंड ऑर्डर को दुरस्‍त करने के लिए अपनी चुनी हुई सरकार का सिर फोड़ सकते हैं।

यह देश जालिम और मजलूम की कहानी नहीं कि जालिम से प्रतिशोध के बाद हम जश्‍न मनाएंगे, यह भयावह है कि हम भारतवासी मौत का जश्‍न मना रहे हैं, जबकि मौत का मातम मनाया जाता है। इसलिए याद रखिए हमारे पास तालिबान का कोई विकल्प नहीं है, इसके बाद अंत में हमारे पास दो ही चीज़ें बचेगीं, एक देह और दूसरी बंदूक।

देह और बंदूक दोनों के बीच एक धांय की आवाज और बारुद की थोड़ी सी गंध। और अंतत: एक हत्या। या शायद बहुत सारी हत्याएं, एक नरसंहार या बहुत सारे नरसंहार। बहुत सारे और लगातार... क्‍योंकि बलात्‍कारियों और अपराधियों की भीड़ है, लाशों का मलबा उठाते हुए आपकी आत्‍मा और जेहन गंध से भर जाएंगे। देर रात तक आप अपने आसपास गोलियों की धांय-धांय सुनते रहेंगे, क्‍योंकि जिन्‍हें मारा जाना है उनकी सूची बहुत लंबी है और जिन बेगुनाहों को बचाना है उनकी सूची उससे भी ज्‍यादा लंबी है। तो चुनिये भारत या भारत के अलावा कुछ और... शेष आप सभी का स्वागत है। इतना ही यथेष्‍ट है।

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