उन्नाव और हैदराबाद : बात, एक और स्त्री को जलाए जाने के बाद...


तुम हो कौन? एक स्त्री ही ना? कभी जलाई जाती थी अपने पति के साथ सती बना कर, आज जलाई जाती हो देह के पिपासु नरपिशाचों के द्वारा...

तुम हो कौन एक स्त्री ही ना.... फिर-फिर जलाई जा रही है एक स्त्री, लगातार जलाई जा रही है स्त्री...

उत्तरप्रदेश के उन्नाव में मानवता को शर्मसार करने वाली एक और नृशंस, शर्मनाक, दर्दनाक और खौफनाक घटना सामने आई है।

एक दुष्कर्म पीड़िता को जमानत पर छूट कर आए 2 आरोपियों ने अपने 3 साथियों के साथ मिलकर जिंदा जला दिया।


पीड़िता युवती 80 प्रतिशत तक जल गई है, गंभीर रूप से झुलसी पीड़िता ने अपने बयान में दोनों आरोपियों का नाम लिया है।

पीड़िता ने बताया कि दुष्कर्म के आरोपी ने लाठी, डंडे, चाकू से वार कर दिया। उसके बाद पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

पूर्व घटना 12 दिसंबर 2018 की थी। बिहार के लड़कों ने एक युवती का अपहरण कर सामूहिक दुष्कृत्य
किया था। आरोपियों ने जमानत पर छूटकर आने पर युवती के साथ इस निर्लज्ज घटना को अंजाम दिया।

की घटना के तुंरत बाद इस घटना ने हिला कर रख दिया है। से मन को जलाकर राख कर फिर देह को जलाया जा रहा है। सवाल अब

ये नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है सवाल अब ये है कि ऐसा समाज के कौन लोग कर रहे हैं?

देश की बहुत बड़ी आबादी में एक ऐसा विभत्स, आदिम और पाशविक समाज पनप रहा है जो सभ्यता, संस्कृति, मानवता, परस्पर सम्मान और स्नेह जैसे शब्दों से नितांत अपरिचित है। वे सिर्फ जी रहे हैं तमाम अनैतिक और असभ्य गतिविधियों के साथ। उन्हें सिर्फ अपना पेट, अपनी भूख, अपना शरीर और अपना सुख दिखाई देता है। महसूस कुछ नहीं होता। ये वे बेपरवाह लोग हैं जिनके लिए बाकी दुनिया की नाजुक भावनाएं 'मूर्खता' है, उनकी समझ से परे हैं, और उच्च वर्ग की लाइफ स्टाइल उनके लिए कुंठा का कारण...

ये कुंठा कमजोर और दुर्बल पर निकाल कर ये अपने छद्म अहम को पोषित करते हैं। अपराध जिनके लिए सामान्य दिनचर्या है। इनके जीवन के कोई उद्देश्य नहीं, जीवन के प्रति इनका वैसा मोह भी नहीं। मारकाट, रक्त, दुष्कृत्य इनके रोज के काम हैं। स्त्री इनके लिए भोग्या के अतिरिक्त कुछ भी नहीं.. कुछ भी नहीं मतलब, कुछ भी नहीं...बहुत हुआ तो पैसा कमाने का जरिया।

ऐसे में कब, कौन सी स्त्री इन्हें अपने शिकार के लिए उपयुक्त लगती है और किसे ये दुष्कृत्य के उपरांत ठिकाने लगा देते हैं यह सब समाज की परत पर पूरी तरह से आ ही नहीं पाता। सतह पर आते हैं कुछ किस्से, कुछ घटना, कुछ वारदात.. बाकी सब हो रहा है कोई देखने सुनने और समझने वाला नहीं है।

हमें अपने समाज का बस वही चेहरा दिखता है जितना हम देखना चाहते हैं। मैं सुरक्षित, मेरा घर सुरक्षित, मेरा माहौल सुरक्षित.. लेकिन बाकी समाज का क्या? जिसके बीच हमें रहना है, जिनके बीच से हमें गुजरना है, जिनके साथ ही जीना हमारी मजबूरी है। उन पर सोचना भी हमारी ही जिम्मेदारी है

ये हम कब समझेंगे... जानते हैं कि एक साथ पूरा का पूरा समाज नहीं बदला जा सकता,हर किसी के दिमाग में पनप रही गंदगी को नहीं पहचाना जा सकता.. जहां कोई पति अपनी पत्नी को मार कर सांप से कटवाने का प्लान भी बना लेता है और उसे पता भी नहीं चलता तो यह तो पूरे के पूरे समाज की बात है।

लेकिन इन हालात पर एक ही निर्णयात्मक बात कहना मुश्किल है। इसी देश में भयानक परिस्थितियों से गुजर कर लड़कियां आगे भी निकली है। इसी देश में घोर गरीबी और कंगाली के बीच से सितारे दमके हैं। इसी देश में बस्तियों में रहने वालों के मानस बदलने के अभियान चलाए जा रहे हैं।

नशाखोरी और अपराध के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है।

इसलिए मेरा देश असुरिक्षत नहीं है। मेरे देश का माहौल भयावह नहीं है।

मेरे देश के अलग-अलग हिस्सों में पनप रही और निरंतर फैल रही आपराधिक वृत्ति, प्रवृत्ति और रूझान सबके लिए दुख और चिंता का विषय है।

अनैतिक सोच और बस 'मैं और मेरा सुख का बेसब्र लालच' ही है जो दीमक की तरह खोखला कर रहा है हमारी संस्कृति को।

अच्छी सोच और अच्छे संस्कार, अच्छी कमाई और अच्छा जीवन ना बहुत ऊपर उच्च कुलीन और 'संभ्रांत' कहे जाने वाले वर्ग में है ना बहुत नीचे जो बस्तियों में दिन गुजार रहे हैं, यह सब सिर्फ मध्यम वर्ग की जिम्मेदारी बनकर रह गए हैं। इसलिए आहत भी हम उसी स्तर पर होते हैं जिस स्तर तक हमारी संवेदनाएं जीवित है। आसपास का परिवेश हमें एक ऐसा नागरिक बनाता है जो देश के लिए, देश के नागरिकों के लिए और अपने से अलग हर व्यक्ति के लिए शुभ सोचता हो। स्त्री के लिए इन सबसे अधिक बेहतर सोचता हो... लेकिन क्या यह पूरा सच है? क्या हम सबको वैसा परिवेश दे पा रहे हैं?

मेरे देश में सभ्यता, संस्कृति और सुरक्षा आज भी है पर मैं दुखी हूं कि भी मेरे ही देश में है। जलाने वाले युवा भी मेरे देश के ही हैं और जो जली है, जलाई गई है वो भी तो मेरे ही देश की है...मैं अपने दुख और क्रोध को अव्यक्त नहीं रखना चाहती पर इसे व्यक्त कहां करूं मुझे नहीं पता... मैं महसूस नहीं कर सकती वह व्यथा,पीड़ा और वेदना जो शरीर के जलने पर होती है क्योंकि मैं तो माचिस की एक तीली भर के लगने पर चीख उठती हूं...मैं क्या जानूं तेजाब क्या होता है? कहां से लाऊं जहरीले शब्द, खौलते हुए वाक्य, उबलते हुए संवाद... एक स्त्री और फिर एक और स्त्री
को जलाए जाने के बाद...


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