अपने लगाए जंगल में वनखंडी महाराज नैनीताल से पच्चीस किलोमीटर दूर सातताल की ऊँची पहाड़ी में, जिसे हिडिंबा पर्वत कहते हैं, एक साधुवेशधारी वनखंडी महाराज ने 200 प्रजाति के चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का एक ऐसा अद्भुत जंगल तैयार कर दिया कि वन विभाग भी उनका मुरीद बन गया।
वनखंडी महाराज ने 14 हैक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जंगल में मैदान से लेकर पहाड़ी क्षेत्र तक को पौधों से भर दिया है। इसको देखकर वन विभाग ने इस क्षेत्र में चौदह हैक्टेयर का आरक्षित वन 'भारत माता उद्यान' के नाम से संरक्षित करने का इरादा कर लिया है जिसके तहत इस पूरे क्षेत्र को वन विभाग ने दीवारबंदी से भी घेर रखा है।
1984-85 में वन विभाग ने इस क्षेत्र के पाँच हैक्टेयर क्षेत्र में बाबा के काम का असर देखते हुए इस क्षेत्र को वनखंडी आश्रम को लीज पर देने का प्रस्ताव भी किया जो कि आज तक यथार्थ रूप तो नहीं ले सका लेकिन चौदह हैक्टेयर में 'भारत माता उद्यान' की घोषणा वन विभाग ने जरूर कर दी।
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1978 में 14 दिसंबर को जब वनखंडी महाराज यहाँ आए थे तो उन्होंने यहाँ चीड़ का फैलता जंगल देखा। स्थानीय प्रजाति की चौड़ी पत्ती वाले पेड़ यहाँ थे ही नहीं। उन्होंने अपनी पूरी साधना इसी ओर मोड़ दी। प्रभु भजन के अलावा वन संवर्द्धन उनका मकसद बन गया। वनखंडी महाराज के अनुसार पशु-पक्षी एवं जंगली जानवर ऋषि-मुनियों के आश्रमों की शोभा रहे हैं। यहाँ के जंगल में तो मेरे आने के वक्त कुछ था ही नहीं। मैंने जंगल लगाना शुरू किया तो अब यहाँ पशु-पक्षी भी आने लगे हैं। पूरे दिन भर अब लोग भी मुझे मिलने आते हैं। जंगल को देखने के लिए भी दूर-दूर से लोगों का आना जारी है।
नवरात्रियों में यहाँ पूजा की जाती है तो भंडारे में स्थानीय लोग खूब आते हैं। यह वनदुर्गा का एक मंदिर बन गया है। शिवरात्रि पर भी पूजन को लोग चले आते हैं। दत्तात्रेय जयंती भी यहाँ मनाई जाती है जो एक हफ्ते तक चलती है। इस जंगल में काम का संज्ञान राष्ट्रपति रहते हुए ज्ञानी जैलसिंह ने भी लिया था लेकिन अब सत्ताधारी कम ही यहाँ आते हैं।
यहाँ वनस्पतियों की मिश्रित प्रजातियों से पानी के चश्मे भी पैदा हो गए। पशु-पक्षी आने शुरू हुए तो फलदार वृक्ष एवं औषधीय वृक्ष रुद्राक्ष वृक्ष आदि के उगाए जाने से उनका उत्साह बढ़ा तो उन्होंने इसे ही जीवन का ध्येय समझ अपनी साधना को इसी तरफ मोड़ इसी में प्रभु को देखना शुरू किया। यहाँ आने वालों को जंगल के लाभ दिखाना और उनको इसके लिए प्रशिक्षित करना उनका मकसद बन गया।
गाँव वालों द्वारा हरण, आँवला, जामुन, बांज एवं धौल जैसी वृक्ष प्रजातियों की लापिंग कर चारापत्ती के लिए वनों को उजाड़ना सबसे बड़ी बाधा बन गई। इसकी सुरक्षा के इंतजाम करने में सहयोग ग्रामीणों का है तो सही लेकिन सबके जागरूक न होने से कुछ लोग जंगल को नुकसान पहुँचा देते हैं वह भी ऐसे वृक्षों को जो दुर्लभ प्रजाति के हैं। मात्र चारापत्ती एवं जानवरों को पालने के लिए यह एक साधन न बने इसको समझाना एक जटिल समस्या है।
भारत माता वन के नाम से 40 हैक्टेयर में वन विभाग द्वारा परिसीमन करने के बाद इस पूरे क्षेत्र में भारत माता के नाम से वन लगने लगा है यह संप्रदाय विशेष का न होकर सारे भारतवासियों का मंदिर बन जाएगा। गर्म जगह से लेकर ठंडे प्रदेश तक की वनस्पति यहाँ उगने से यह आयुर्वेद की भी प्रयोगशाला बन सकता है। प्रदेश के पूर्व वनमंत्री बंशीधर भगत ने इस वन संरक्षण को अद्भुत बताया। उनका कहना था कि जहाँ सरकारी विभाग करोड़ों रुपए के प्लान बनाकर यह करिश्मा नहीं कर सके, वहीं बाबाजी की साधना ने वह कर दिखाया जो कि पूरे समाज की प्रेरणा बन गया।
जब यह वन तैयार होने लगा और कई प्रकार के पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगा तो बाबा को लगा कि उनकी वनदुर्गा प्रसन्न होने लगी है। इसी क्षण को वे अहम मानने लगे। वनदुर्गा को प्रसन्न जान वे इस काम में रात-दिन अब भी जुटे हैं।