नाग मनुष्य थे या रेंगने वाले सरीसृप, जानिए रहस्य

Nag dev
सवाल यह उठता है कि जिन नागों की पूजा होती है वह मनुष्य थे या कि सचमुच ही या दोनों? यही सवाल गणेश के संबंध में भी उठता है और यही सवाल, मूषक, नंदी, शनि, चंद्र, बुद्ध के संबंध में भी। आओ इसे जानने का प्रयास करते हैं।

प्राचीन या पौराणिक काल में मनुष्‍य का सामना प्रकृति और आसपास के प्राणियों से ही हुआ था। इसीलिए उन्होंने सबसे पहले अपने नाम उनके नाम पर ही रखे थे। जैसे हमारे जितने भी प्राचीन ऋषि मुनि हैं उन सभी के नाम किसी न किसी पशु या पक्षियों पर ही रखे गए हैं। कश्यप बना कच्छप से, गौतम बना बैल से, गर्ग बना सांड़ से, ऋषभ बना वृषभ से, अज मतलब बकरा, काक मतलब कौआ, पैप्पलाद मतलब शुक, तित्तिर मतलब तितर, कठ, अलि मतलब भ्रमर, कौशिक मतलब उल्लू आदि। इस तरह हमने देखा कि प्रारंभ में लोग पशु-पक्षी और ग्रह-नक्षत्रों आदि पर अपने नाम रखते थे, जो कुछ समानार्थी शब्द होते थे।

इसी आधार पर ग्रंथों के नाम भी रखे गए। जैसे, उपनिषदों की बात करें तो माण्डूकायन, आश्वलायन, छांदोग्य, तैत्तिरीय, वराह, श्वेताश्वर आदि। माण्डूक्य का अर्थ मेंढक, आश्वलायन का अश्व का शाला अर्थात घुड़शाला, तैत्तिरीय अर्थात तितर, वराह अर्थात सूअर, श्वेताश्वर अर्थात सफेद खच्चर आदि। उपनिषदों को अरण्य भी कहा जाता है जिसका अर्थ जंगल होता है।

बहुत से ऐसे मानव है जिनके मुख सर्प, बकरे, गाय या शेर के समान होते हैं। प्राचीन काल में यह भी प्रचलन था कि जिस व्यक्ति का मुख जिसके समान दिखाई दे उसका नाम उसके अनुसार ही रख दिया जाए। सामुद्रिक शास्त्र में इंसानी चेहरों का अच्छे से वर्णन मिलता है। कुछ ऐसे समाज हैं जिनके चेहरे समान दिखाई देते हैं तो उस समाज का नाम भी उसी तरह के पशु या पक्षी पर रख दिया जाता था।

बाद में जब सभ्यता और समझ आगे बढ़ी तो उन्होंने प्रकृति, पशु, पक्षी को छोड़कर अन्य नाम भी रखना प्रारंभ किए। फिर नाम ज्ञान और कार्य के आधार पर रखेन जाने लगे। ऐसे में अब यह समझना जरूरी है कि प्राचीन काल में यदि किसी मनुष्य या समाज का नाम रख लिया गया हो तो क्या हम उसे नाग या मान लें?

कहते हैं कि मूषक नाम की दक्षिण भारत में एक जाति थी जिसे हाथी वाले राजा ने हराया था। हमने यह कथा भी पढ़ी है कि पहले गणेशजी का मूषक से युद्ध हुआ था बाद में वह उनका वाहन बना था। दरअसल, प्राचीन काल की परिस्थितियां ऐसी रही थी जिसमें मनुष्य या उसका समाज अपने स्थान की प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र, पशु-पक्षीयों के नाम आसानी से रख लेता था। क्योंकि उस कल में यह बहुत महत्व रखते थे। इसी से उसका जीवन चलता था।

प्रारंभ में धरती का जब भौगोलिक विभाजन किया गया तो उस विभाजन में उसकी प्रकृति के अनुसार ही उसका नाम रखा गया। जैसे पुराणों और वेदों के अनुसार धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसका नाम जम्बू इसलिए कि यहां जम्बू के वृक्ष बहुतायत में होते थे।
दरअसल, प्राचीन जनजातीय समूह के प्रतीक चिन्ह या ध्वज अपने किसी स्‍थानीय पशु या पक्षियों पर ही होते थे। आज भी हम देखते हैं तो बहुत सी जातियां या समाज ऐसे हैं जिनके नाम आपको किसी पशु या पक्षियों पर आधारित ही मिलेंगे। मैसूर की आदिवासी जातियों में 'श्वान' नाम की जनजाति अब भी है। आज भी उत्तर भारत में वराह नाम की जाति विद्यमान है। कहने का अर्थ यह हुआ की जो वैदिक साहित्य में श्वान, हाथी, खच्चर, मांडूक्य, मत्स्य, मूषक जैसे नामों वाले या चिन्ह वाले पात्र है वह दरअसल व्यक्ति ही थे।
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इसी प्रकार भारत में नागों के बारे में भी मिथक है, नाग मतलब सर्प या सांप। दरअसल, भारत में नागों की पूजा होती है, क्योंकि नाग एक रहस्यमयी प्राणी हैं। उसमें अजीब शक्तियां होती हैं। यही कारण है कि कुछ जनजातीय समूह ने अपने समूह का नाम नागों पर रखा।

भारत में एक ऋषि हुए हैं जिनका नाम कश्यप था। उनकी कई पत्नियां थीं जिसमें से एक पत्नी नागवंशी थी। उसका नाम कद्रू था। कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें 8 पुत्र मिले जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं- 1.अनंत (शेष), 2.वासुकि, 3.तक्षक, 4.कर्कोटक, 5.पद्म, 6.महापद्म, 7.शंख और 8.कुलिक। इन्हें ही नागों का प्रमुख अष्टकुल कहा जाता है। कुछ पुराणों के अनुसार नागों के अष्टकुल क्रमश: इस प्रकार हैं:- वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड़, महापद्म और धनंजय। कुछ पुराणों अनुसार नागों के प्रमुख पांच कुल थे- अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला। शेषनाग ने भगवान विष्णु तो उनके छोटे भाई वासुकी ने शिवजी का सेवक बनना स्वीकार किया था।

भारत में उपरोक्त आठों के कुल का ही क्रमश: विस्तार हुआ जिनमें निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।

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अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। नागों का पृथक नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असम, नागालैंड, मणिपुर, केरल और आंध्रप्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है। ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि।

यह सभी नाग को पूजने वाले नागकुल थे इसीलिए उन्होंने नागों की प्रजातियों पर अपने कुल का नाम रखा। जैसे तक्षक नाग के नाम पर एक व्यक्ति जिसने अपना 'तक्षक' कुल चलाया। उक्त व्यक्ति का नाम भी तक्षक था जिसने राजा परीक्षित की हत्या कर दी थी। बाद में परीक्षित के पुत्र जन्मजेय ने तक्षक से बदला लिया था।

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'नागा आदिवासी' का संबंध भी नागों से ही माना गया है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नाग वंशियों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में मध्यप्रदेश के विदिशा पर शासन करने वाले नाग वंशीय राजाओं में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि आदि का उल्लेख मिलता है।

पुराणों अनुसार एक समय ऐसा था जबकि नागा समुदाय पूरे भारत (पाक-बांग्लादेश सहित) के शासक थे। उस दौरान उन्होंने भारत के बाहर भी कई स्थानों पर अपनी विजय पताकाएं फहराई थीं। तक्षक, तनक और तुश्त नागाओं के राजवंशों की लम्बी परंपरा रही है। इन नाग वंशियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सभी समुदाय और प्रांत के लोग थे।

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नाग और नाग जाति :
जिस तरह सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और अग्निवंशी माने गए हैं उसी तरह नागवंशियों की भी प्राचीन परंपरा रही है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे। विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था। ये लोग सर्प पूजक होने के कारण नागवंशी कहलाए। कुछ विद्वान मानते हैं कि शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी। अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को 'नागभाषा' कहते हैं।

एक सिद्धांत अनुसार ये मूलत: कश्मीर के थे। कश्मीर का 'अनंतनाग' इलाका इनका गढ़ माना जाता था। कांगड़ा, कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नाग ब्राह्मणों की एक जाति आज भी मौजूद है। नाग वंशावलियों में 'शेष नाग' को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेष नाग को ही 'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।

शहर और गांव :
नागवंशियों ने भारत के कई हिस्सों पर राज किया था। इसी कारण भारत के कई शहर और गांव 'नाग' शब्द पर आधारित हैं। मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था। वहां की नदी का नाम नाग नदी भी नागवंशियों के कारण ही पड़ा। नागपुर के पास ही प्राचीन नागरधन नामक एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक नगर है। महार जाति के आधार पर ही महाराष्ट्र से महाराष्ट्र हो गया। महार जाति भी नागवंशियों की ही एक जाति थी। इसके अलावा हिंदीभाषी राज्यों में 'नागदाह' नामक कई शहर और गांव मिल जाएंगे। उक्त स्थान से भी नागों के संबंध में कई किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं। नगा या नागालैंड को क्यों नहीं नागों या नागवंशियों की भूमि माना जा सकता है।

नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स।

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