खेचरी मुद्रा से मिलती है समाधि और सिद्धि

मनुष्य की जीभ (जिह्वा) दो तरह की होती हैं- लंबी और छोटी। लंबी जीभ को सर्पजिह्वा कहते हैं। कुछ लोगों की जीभ लंबी होने से वे उसे आसानी से नासिकाग्र पर लगा सकते हैं और खेचरी-मुद्रा कर सकते हैं। मगर जिसकी जीभ छोटी होती है उसे तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले उन्हें अपनी जीभ लंबी करनी पड़ती है और उसके लिए घर्षण व दोहन का सहारा लेना पड़ता है। जीभ नीचे की ओर से जिस नाड़ी से जुड़ी होती है उसे काटना पड़ता है।

खेचरी मुद्रा को सिद्ध करने एवं अमृत के स्राव हेतु आवश्यक उद्दीपन में कुछ वर्ष भी लग सकते हें। यह व्यक्ति की योग्यता पर भी निर्भर करता है। योग में कुछ मुद्राएं ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ योगी ही करते हैं। सामान्यजनों को इन्हें नहीं करना चाहिए। खेचरी मुद्रा साधकों के लिए मानी गई है।

विधि- इसके लिए जीभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है अर्थात एक दिन जौ भर काटकर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है।
इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।

इसका अभ्यास करने से कुछ महीनों में जीभ इतनी लंबी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा (उल्टा करने) दिया जाए तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बंद कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।
लाभ- इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और सामधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है। साधनारत साधुओं के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायी मानी जाती है।

विशेषता- निरंतर अभ्यास करते रहने से जिब जब लंबी हो जाती है, तब उसे नासिका रन्ध्रों में प्रवेश कराया जा सकता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से कपाल मार्ग एवं बिंदु विसर्ग से संबंधित कुछ ग्रंथियों में उद्दीपन होता है। जिसके परिणामस्वरूप अमृत का स्राव आरंभ होता है। उसी अमृत का स्राव होते वक्त एक विशेष प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव होता है। इस अनुभव से सिद्धि और समाधि में तेजी से प्रगति होती है।
चेतावनी- यह आलेख सिर्फ जानकारी हेतु है। कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास न करे, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं।

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